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Saturday, September 8, 2018

"बेटी का साया "


"बेटी का साया "

हथेली के बराबर सी है  तू, छोटी सी रुई का गोला सी,
गोदी में ले , सीने से लगाया है , अलसायी नन्ही जान सी,
अपने छोटे हाथो की मुट्ठी से तूने , मेरी छोटी ऊँगली को पकड़ा है ,
पिघल गया हू  इस घडी, पत्थर मै , पिता बनने का सुख पाया है ,
खुशकिस्मत हूँ , ज़िन्दगी में मेरी , बेटी का साया आया है. 

नन्हे कदमो से तू, चलन लगी है, चाबी भरी गुड़िया सी,
कसकर तेरे हाथ पकड़कर, साथ भागता हूँ, तू भागती है शैतानी पुड़िया सी,
गिर न जाए तू, जिगर मुँह में रहता है,
हंसी तेरी , रोने में ना बदले , फ़िक्र में रहता हैं ,
खुशकिस्मत हूँ , ज़िन्दगी में मेरी , बेटी का साया आया है. 

फ्रॉक पहनकर , गोल घुमकर , पूछना तेरा, पापा लग रही हू  कैसी ?
क्या बताऊ गुड्डा, तारे बिखरे हो, बीच में  तू चाँद जैसी. ,
तेरे बालो को गुथकर , दो छोटी बना , तेरी माँ ने जो सजाया है,
सच में ,तुझे देखकर, हर जहा का सुख , मैंने पाया है ,
खुशकिस्मत हूँ , ज़िन्दगी में मेरी , बेटी का साया आया है.

छोटी छोटी ज़िद तेरी, छोटे से तेरे मुख से, सुन लेता,
पर दिल मेरा ,तेरी आँखों के टिमटिमाने पैर रहता,
हठ तू करती , मुस्कान अपनी छुपाकर, तेरी हर ज़िद पूरी है,
कुटिल तेरी मुस्कान, झूठा हठ, सब समझ आया है,
खुशकिस्मत हूँ , ज़िन्दगी में मेरी , बेटी का साया आया है.

खेलते ,खिलते, इश्वर , परीक्षा ले लेता,
वर्षो का भरोसा पल भर में टूटता , जो बीमार तुझे वो कर देता,
बुखार से तपती , नन्ही देह तेरी, दिल मेरा रोता  है.
तेरी हर तकलीफ को मैंने , इश्वर से माँगा है,. 
खुशकिस्मत हूँ , ज़िन्दगी में मेरी , बेटी का साया आया है.

तीन बरस की काया तेरी,पर संसार तुझे देखना है,
इसलिए तो गुड्डा तुझे , पापा ने तेरे , कंधे पे बिठाया है,
आतुर तेरी आँखों को, हर दृश्य, विस्मित करता है,
कंधे पैर बैठी , गौरव मेरा, सबको हर्षित करता है। 
खुशकिस्मत हूँ , ज़िन्दगी में मेरी , बेटी का साया आया है.
  
 पांच बरस की गुड्डा  तू, स्कूल जाया करती है,
मेरे सिखलाये पाठ तू , मुझे पढ़ाया करती है ,
टीचर टीचर खेल में , तेरी क्लास का में बच्चा बनता हूँ,
छड़ी से मार खा के भी , मन मेरा हसता   है,
खुशकिस्मत हूँ , ज़िन्दगी में मेरी , बेटी का साया आया है.

छड़ी लगने का नाटक कर , जो मै रोता हूँ ,
छड़ी पटककर , तू मुझे , प्यार से पुचकारती है,
छोटे छोटे हांथो से सेहला , प्यार मुझे दिखलाती है,
हर रोज़ ये छड़ी वाली, मार ,अब दिल खाना चाहता  है ,
खुशकिस्मत हूँ , ज़िन्दगी में मेरी , बेटी का साया आया है.

पापा मुझे छोड़ोगे तो नहीं ? एक दिन, ऐसे ही ,तूने पूछा था,
उस दिन तुझे , गले लगाकर , वचन तुझसे ये किया था,
जब तक सांसो की माला है, इस देह में जब तक , प्राण रहेगा,
हृदय के आखिरी स्पंदन तक, बेटी तेरे साथ , ये पिता रहेगा,
खुशकिस्मत हूँ , ज़िन्दगी में मेरी , बेटी का साया आया है.

बेटी पराया धन, कहती दुनिया, छोड़ मुझको चले जाना,
इन व्यर्थ सामाजिक ढकोसलो का, हसकर मखौल है उड़ाना,
रिश्ता लहू का , बाप बेटी का, ईश्वर ने सुढृढ़ बनाया है,
मार तमाचा समाज को, बेटियों ने ,आसमान में घर बनाया है,
खुशकिस्मत हूँ , ज़िन्दगी में मेरी , बेटी का साया आया है.

शोभा बने तू , किसी भी आंगन की, बाग़ की मेरे कली रहेगी,
रहे किसी भी घर में तू, पिता के दिल में , हमेशा रहेगी,
तू बेटा होती , तो भी तुझे , जाने से , न रोक पाता मै ,
प्रगति चक्र में ,बढ़ने को , हर पिता ने नन्हे कदमो को ,आगे बढ़ाया है,
खुशकिस्मत हूँ , ज़िन्दगी में मेरी , बेटी का साया आया है.

छत पर बैठ रोज़ मै , अपनी नन्ही चिड़िया की उड़ान देखूंगा,
मिल ना पाउ , चाहे रोज़ाना, फ़ोन तो हर दिन किया करूँगा,
प्रकृति का नियम ये, बच्चो को एक दिन उड़ जाना,
पक्षियों ने भी क्या, अपने बच्चो को, उड़ना सिखाया है?
खुशकिस्मत हूँ , ज़िन्दगी में मेरी , बेटी का साया आया है.

तू इतना उचा उड़ , मेरी गुड्डा, दुनिया तुझे छोटी नज़र आये,
ये समाज , रीति, रिवाज़ो,के बंधन , तुझे कभी जकड न पाए,
है पिता तेरा, तेरे पीछे, बन शक्ति तेरी, तू बस पंख पसार उड़ जाना ,
उन्मुक्त उड़ान का सुख लेना , हर बेटी को दिखला देना,
हर पिता को , एहसास कराना है,
खुशकिस्मत हैं वह , ज़िन्दगी में जिसके  , बेटी का साया आया है.

लेखक : मयंक दुबे (अपनी बेटी मायशा दुबे के लिए )



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